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इन छह कारणों से भोजपुरी सिनेमा नहीं बना पाता बेहतरीन फिल्में

Posted On: 8 Aug, 2015 Entertainment में

Chandan Roy

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भोजपुरी सिनेमा का गौरवशाली इतिहास रहा है. भोजपुरी सिनेमा और इसकी भाषा को रामायण तिवारी, भिखारी ठाकुर, नाजिर हुसैन, लक्ष्मण शाहाबादी, सुमीत कुमार आदि लोगों ने विकसित करने का काम किया है लेकिन दुर्भाग्य से भोजपुरी सिनेमा की बागडोर आज जिन हाथों में है वह हाथ रुग्ण है. भोजपुरी सिनेमा की गौरवशाली इतिहास को आज के निर्माता-निर्देशक अपनी छिछोरी एवं अश्लील सिनेमा से बर्बाद कर रहे हैं. भोजपुरी अपनी मीठी जुबान के लिए जाना जाता है परन्तु कुछ फिल्मों ने भोजपुरी के मायने एवं छवि को बिगाड़ कर रखा दिया है. आज अश्लीलता भोजपुरी सिनेमा का पर्याय बन चूका है. क्यों भोजपुरी सिनेमा का मतलब अश्लीलता है जानिए प्रमुख कारणों को?


chandan gunja


निश्चित रूप से भारत के अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर बनने वाली फिल्मों के मुकाबले आज भोजपुरी सिनेमा हाशिए पर है. भोजपुरी सिनेमा की इस दुर्दशा के लिए कई सारे कारण है. हालाँकि भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत शानदार रहा है. पहली भोजपुरी सिनेमा 1961 में आई थी जिसका नाम था “गंगा मैय्या तोहे पियरी चढ़ैबो”. इसके बाद “लागी नाही छूटे राम”, “बिदेसिया”, “धरती मईया”, “गंगा किनारे मोरा गांव” आदि फिल्मों को दर्शकों ने खूब सराहा.


bhojpuri


भोजपुरी सिनेमा में अश्लीलता के कारण

चाहिए सरकारी सब्सिडी- भोजपुरी सिनेमा अपनी आर्थिक तंगी से बेहाल है. जिसका फायदा उठाकर कुछ माफियाओं ने अपना काला धन और हवाला के जरिए प्राप्त पैसों को भोजपुरी सिनेमा में लगाकर अपने दामन के दाग को साफ कर रहे हैं. इस दिशा में पहल करते हुए भोजपुरी सिनेमा के निर्माण में बिहार सरकार को सब्सिडी मुहैया करानी चाहिए ताकि यह उद्योग आर्थिक तंगी से उबरकर सृजनात्मकता का निर्माण कर सके.


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कम बजट- भोजपुरी सिनेमा कम बजट की होती है जिससे कई तरह की समस्या आती है. कम बजट के कारण नया प्रयोग नहीं हो पाता है.ऐसे में एक ही रास्ता बचता है कि अश्लीलता परोसकर ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाया जाए. इन फिल्मों में बेहतर कलाकार, निर्देशक, तकनीक आदि की कमी साफ दिखती है और इस कमी को दूर करने के लिए फिल्मों का बजट बढ़ाना बेहद जरूरी है.


Rinku-Ghosh


दर्शक वर्ग- भोजपुरी सिनेमा का अपना दर्शन वर्ग होता है. फिल्म में व्याप्त अश्लीलता के कारण भोजपुरी सिनेमा सामाजिक और पारिवारिक सिनेमा न रहकर कुछ वर्ग तक सीमित रह गया है. आम तौर पर देखा गया है कि दिहाड़ी मजदूर एवम गाँव-देहात के लोग ही भोजपुरी सिनेमा के नियमित दर्शक होते हैं. इन दर्शकों को मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोसी जाती है.


निर्माता किसी और समाज से- फिल्म में पैसे लगाने वाले ज्यादातर निर्माता भोजपुरी समाज से बाहर के होते हैं. इन निर्माताओं का एक मात्र उद्देश्य कम लागत में ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाना है. उन्हें फिल्मों के माध्यम से परोसी जा रही अश्लीलता और भोजपुरी भाषा की दुर्दशा की कोई परवाह नहीं है.


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अश्लीलता चलती है- ज्यादातर भोजपुरी निर्माता खुद का बचाव करते हुए कहते हैं कि हम वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं. लेकिन इसे सही तर्क नहीं कहा जा सकता है. हालाँकि यह सच है कि फिल्मों में अश्लीलता को मनोरंजन का जामा पहनाकर खूब बेचा जा रहा है, और दर्शक वर्ग विकल्प के अभाव में अश्लीलता को ही देखने के लिए मजबूर हैं.


पुराने ढर्रे से हटने की हिम्मत नहीं- निर्माता-निर्देशक फिल्मों में बेवजह हिंसा और उत्तेजना के आलावा कुछ हटकर दिखाने की हिम्मत नहीं करते हैं. क्षेत्रीय सिनेमा समाज में बदलाव की पर्याप्त संभावना है. आज एक ऐसे भोजपुरी निर्माता-निर्देशक की जरूरत है जो लीक से हटकर फिल्में बनाएं और भोजपुरी सिनेमा के बिगड़ते स्वरूप को नया रूप दे.Next…


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